चौक की रस्म

हिन्दू संस्कारों ने “सीमान्तो नयन संस्कार” का विशेष महत्व है जो गर्भस्थ शिशु के सातवें महीने में किया जाता है। आमतौर से लोग इसे चौक की रस्म, गोद भराई या सतवासे की रीति कहते हैं। यह रस्म ससुराल के आंगन में पूरी की जाती है और इसके लिए उपहार लड़की के मायके से आते हैं। जिसमें सर्वाधिक कलापूर्ण ” गोठे की साड़ी’ सात गज सफेद तनजेब की होती है जो लड़की के मायके की बहू-बेटियां बड़े उत्साह से लोक रगों तथा लोक आलेखनों से सुचित्रित करती हैं। इस प्रक्रिया को ‘गोठा गोठना’ कहते हैं। यह पूरी साड़ी बार्डर, बूटी और पल्लेदार बनायी जाती है इसकी तमाम कारीगरी हल्दी मिले ऐपन सींक और फुलहरी द्वारा की जाती है। सज्जा का अन्तिम रूप देने के लिए पीले सिन्दूर और काजल बिन्दुओं का प्रयोग जिया जाता है । साड़ी की बेल और नीचे की बूटियों के लिए बदलते समय के साथ अब लकड़ी के छापों का प्रयोग भी होता है। गोठे की साड़ी का सर्वाधिक कला कौशल इसके आंचल पर होता है जिसमें यह सारे मंगल प्रतीक लोक देवता नए पशु वनस्पति तथा शुभ चिन्ह बनाई जाते हैं जो अवध के पूजा अवसरों पर रखे जाते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये लोक कलायें जीवन को एक जादू भरा मोहक स्पर्श देती हैं। अवध के धरा अलंकरण में जो भाव बोध है यह जीवन के छिपे रहस्य का अर्थ, लहरदार लयात्मकता लिये हुये हैं। उजले लेपन का अजलापन शान्ति व शुद्धता का परिचायक है।

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