पुरातत्व एवं इतिहास

प्राचीन समय में अयोध्या का नाम कोशलदेश था । अथर्ववेद के अनुसार यह देवताओं द्वारा निर्मित शहर था और अपने आप में इतना समृद्ध था जैसे कि स्वर्ग । यहाँ के उदार राजवंश के राजा इक्ष्वाकु सूर्यवंश के थे । परम्परानुसार राजा इक्ष्वाकु वैवस्तत मनु के सबसे बड़े पुत्र थे जिन्होंने अयोध्या की स्थापना की । धरती का दूसरा नाम ‘पृथ्वी’ इस वंश के छठे राजा पृथू के नाम पर पड़ा । कुछ पीढियों के बाद मान्धाता राजा हुए जिनके वंश के 31  वे राजा हरिश्चन्द्र थे जो अपनी सत्यप्रियता के लिए संसार भर में प्रसिद्ध हुए । इसी वंश के ”राजा सगर” ने अश्वमेघ यज्ञ कराया और उनके महान पौत्र भगीरथ को अपनी तपस्या के द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए प्रसिद्धि मिली । इसके बाद का इतिहास रघुवंश के नाम से आगे बढा़ । उनके पौत्र राजा दशरथ थे, जो भगवान राम के पिता थे, जिनके समय में ‘कौशल’ की सुख समृद्धि एवं प्रसिद्धि अपने शिखर पर थी । इस कथा को महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य में अमर कर दिया जो सदियों से आज तक लोकप्रिय है । पौराणिक परम्परा कं अनुसार, इक्ष्वाकु की 93वीं पीढी में राम के बाद 30वें राजा वृहब्दला इक्ष्वाकु वंश के अंतिम सबसे प्रसिध्द राजा थे । जो महाभारत युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए कौशल का राज्य बुद्ध के समय में छठी शताब्दी ईसापूर्व में अपनी श्रेष्ठता तक पहुंचा । अयोध्या मंदिरों का शहर है और यहाँ पर सभी पूजाघर सिर्फ हिन्दुओं के लिए नहीं हैं। अयोध्या हैं कई धर्मों के लोग पुराने समय से एक साथ रहते आ रहे हैं।

हिन्दु, बोद्ध, जैन और इस्लाम की जीवन्त परम्परायें आज भी अयोध्या में पायी जाती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *