सप्तहरि मंदिर

अयोध्या में प्राचीन काल से सप्त हरियों की परम्परा रही है। ऐसा विश्वास जिया जाता है कि भगवान विष्णु ने विभिन्न तपस्वियों की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें जिन स्थानों पर दर्शन दिया वे हरि तीर्थ के नाम से विख्यात हुये। ये सप्त हरि निम्नवत् हैं।
1. चन्द्रहरि: पौराणिक कथाओं के अनुसार अयोध्या के गौरव और वैभव के दर्शन हेतु महाराज चन्द्रदेव स्वयं यहां आये और विभिन्न तीर्थों की यात्रा की जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु यहीं प्रकट हुये । वर्तमान में राम की पैड़ी पर चन्द्रहरि मन्दिर स्थापित है।
2. धर्महरि: पौराणिक कथा के अनुसार महाराज धर्मराज यहाँ के गौरव और वैभव के दर्शन हेतु पधारे और अत्यन्त प्रभावित होकर नृत्य करते हुये जयद्योष करने लगे जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुय । वर्तमान में मीरापुर मोहल्ले में धर्महरि का मन्दिर है ।
3. बिल्लहरि: अयोध्या के निकट पुरा बाजार नामक स्थान से 3 कि0मी0 दूर सरयू के किनारे बिल्लहरि का स्थान है । पौराणिक कथाओं क अनुसार नारद मुनि क श्राप से ग्रसित हो गर्न्धव को बिल्व रूप धारण करना पड़ा और यह स्थान पर निवास कर रहा था कालान्तर में श्रीराम के दर्शन से लभान्वित होकर उसने मूल रूप प्राप्त किया और परमधाम में चला गया । उसने यहाँ पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की थी ।
4. पुण्यहरि: बिल्लहरि से 10 कि0मी0 फैजाबाद से अंबेडकर नगर की ओर पुनहद गाँव में यह तीर्थ स्थित है । यहीं स्थित कुण्ड में स्नान करने से पाण्डु रोग से मुक्ति होती है।
5-6. गुप्तहरि-चक्रहरि: सरयू नदी के किनारे गुप्तार घाट नामक स्थान ही गुप्तहरि का स्थान है । किंवदन्तियों के अनुसार देवताओं के विशिष्ठ अनुरोध पर भगवान बिष्णु ने स्वयं यहीं गुप्त रूप से निवास कर तपस्या की थी। इसी से इसका नाम गुप्तहरि पड़ा।
7. विष्णुहरि: गुप्तार घाट से पूर्व दिशा में चक्रतीर्थ में विष्णुहरि का स्थान है किंवदन्ति के अनुसार विष्णु शर्मा नामक विद्वान ब्राम्हण ने कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु का दर्शन प्राप्त किया ।